Sunday, December 23, 2018
दिन-रविवार दिनांक-23/12/18 विधा-ग़ज़ल *चलो हम गुनगुनाते हैं* ------------------------------- बहारों में चले आओ, सनम तुम को बुलाते हैं। वही नगमा मुहब्बत का, चलो हम गुनगुनाते हैं ।। हमारी ज़ुल्फ़ लहराई ,हवायें होगईं घायल हमारी हर अदाओं को ,सभी कातिल बताते हैं बनो तुम साज भी मेरा,मिरी आवाज बन जाओ । बुलाती धड़कनें तुम को,तराने कसमसाते हैं ।। सुहानी चाँदनी रातें,हमे पागल बनाती हैं । कभी तुम दूर होते हो,सितारे दिल जलाते हैं।। हमारी साँस थम जाती,अजी जब आप आते हैं । हसीं लगती सभी गलियां,चमन भी मुस्कुराते हैं ।। ✍🏻 स्वरचित रागिनी स्वर्णकार(शर्मा) इंदौर
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मुक्तक : रागिनी की हुंकार तोड़ विषमता की कारा को, समता का रण-शंख बजाओ। विपदा के पर्वत हिल जाएँ, ममता का बल-वज्र चलाओ। रूढ़ि-शिला पर चोट करो अ...
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ख़ुमार ही ख़ुमार है ज़मीं से आसमान तक। बिछी हुई बहार है ज़मीं से आसमान तक।। कली कली महक उठी जो शबनमी फुहार से, निखार ही निखार है ज़मी से आसमा...
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नवगीत ------- -------- बुलन्दी हौंसलों में है , छुयेगी जो सदा मंज़िल ---------------- ----------------- 1222 1222 1222 1222 लिखा इ...