Thursday, November 22, 2018

नवगीत
-------
--------
बुलन्दी हौंसलों में है , छुयेगी जो सदा मंज़िल
----------------
-----------------


1222 1222 1222 1222

लिखा इक गीत है अपना वही मैं आज लाई हूँ ।
रुचेगा भी सभी को ही,वही अंदाज लाई हूँ ।
तनिक मुश्किल हमें होगा,बुराई को हराना भी,
असम्भव हो नहीं सकता,यही आगाज़ लाई हूँ।

करें हर काम मन से हम  ,लिखेंगे नव इबारत फिर
कहेंगे कर्म  ही पूजा, करेंगे यह  इबादत फिर
बुलन्दी हौंसलों में है , छुयेगी जो सदा मंज़िल ,
कहूँगी आसमाँ से अब, नई परवाज लायी हूँ ।

सुना है आदमी  दिल से ,कभी होता नहीं खोटा
भरोसा जो रखो खुद पर,न कोई काम है छोटा
गढ़ेगी रागिनी एक दिन,नई सरगम मुहब्बत की ।
सुनेगा अब जहाँ जिस को,वही आवाज लाई हूँ ।

रागिनी स्वर्णकार(शर्मा )
 इंदौर

No comments:

Post a Comment

 मुक्तक : रागिनी की हुंकार तोड़ विषमता की कारा को, समता का रण-शंख बजाओ। विपदा के पर्वत हिल जाएँ, ममता का बल-वज्र चलाओ। रूढ़ि-शिला पर चोट करो अ...