Tuesday, December 7, 2021

प्रीत पथ अनुगामिनी

प्रीत ही हूँ गुनगुनाती*
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हो रही प्रिय मिलन आतुर ,
लिख रही हूँ प्रणय पाती  ।
प्रीत - पथ अनुगामिनी मैं ,
प्रीत ही हूँ गुनगुनाती ।।

स्वर मुखर होने लगे हैं,
साधना देती निमंत्रण ।
सुधि -सुमन महके हुए हैं,
कर गयी पीड़ा पलायन ।।

गीत लिखती भावनाएं 
धड़कनें संग स्वर मिलाती ।
प्रीत -पथ अनुगामिनी मैं,
प्रीत ही हूँ गुनगुनाती ।।

प्यास की पावन ऋचाएं
स्वाति के कुछ कण पियेंगी । 
तृप्तिक्षण ,अनुभूतियाँ फिर,
प्राण में भर कर जियेंगी ।।

आस  ही दीपक  बनी ,
अन्तर तमस को जगमगाती ।
प्रीत -पथ अनुगामिनी मैं
प्रीत ही हूँ गुनगुनाती ।।

उदित उम्मीदों का सूरज,
छँट गये कुहरे घनेरे ।
स्वर्णिम विहान बुला रहा ,
डालती खुशियाँ हैं डेरे ।।

मीत इन मधुरिम  क्षणों में ,
 सृष्टि ज्यों, लगती बराती  ।
प्रीत -पथ अनुगामिनी मैं,
प्रीत ही हूँ गुनगुनाती  ।।

रागिनी स्वर्णकार (शर्मा)

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