मुक्तक : रागिनी की हुंकार
तोड़ विषमता की कारा को, समता का रण-शंख बजाओ।
विपदा के पर्वत हिल जाएँ, ममता का बल-वज्र चलाओ।
रूढ़ि-शिला पर चोट करो अब, नव-युग का निर्माण करो,
शोषित का स्वर बनकर गरजो, मुक्त-गगन में दीप जलाओ॥
Dr ragini swarnkar
डॉ रागिनी स्वर्णकार