Sunday, August 29, 2021

मुक्तक

 ख़ुमार ही ख़ुमार है ज़मीं से आसमान तक।

बिछी हुई बहार है ज़मीं से आसमान तक।।


कली  कली महक उठी जो शबनमी फुहार से,

 निखार ही निखार  है ज़मी से आसमान तक।।


#रागिनी स्वर्णकार(शर्मा)

इन्दौर

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 मुक्तक : रागिनी की हुंकार तोड़ विषमता की कारा को, समता का रण-शंख बजाओ। विपदा के पर्वत हिल जाएँ, ममता का बल-वज्र चलाओ। रूढ़ि-शिला पर चोट करो अ...