ख़ुमार ही ख़ुमार है ज़मीं से आसमान तक।
बिछी हुई बहार है ज़मीं से आसमान तक।।
कली कली महक उठी जो शबनमी फुहार से,
निखार ही निखार है ज़मी से आसमान तक।।
#रागिनी स्वर्णकार(शर्मा)
इन्दौर
मुक्तक : रागिनी की हुंकार तोड़ विषमता की कारा को, समता का रण-शंख बजाओ। विपदा के पर्वत हिल जाएँ, ममता का बल-वज्र चलाओ। रूढ़ि-शिला पर चोट करो अ...
Superb...
ReplyDeleteWow gajab kardiya!!
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